गण्डकी नदी, नेपाल और बिहार में बहने वाली एक नदी है

जिसे बड़ी गंडक या केवल गंडक भी कहा जाता है।

इस नदी को नेपाल में सालिग्रामि या सालग्रामी और मैदानों मे नारायणी और सप्तगण्डकी कहते हैं।

यूनानी के भूगोलवेत्ताओं की कोंडोचेट्स (Kondochates)[1] तथा महाकाव्यों में उल्लिखित सदानीरा भी यही है।

त्रिवेणी पर्वत के पहले इसमें एक सहायक नदी त्रिशूलगंगा मिलती है।

जानिए पवित्र नदी नारायणी (गंडक) के विषय में जिसमें श्राप के कारण भगवान विष्णु (ठाकुर जी) पत्थर के रूप में रहते हैं ।

हिमालय से निकलकर नेपाल के रास्ते कुशीनगर होकर पटना के पास गंगा में समाहित होने वाली नारायणी को पुराणों ग्रंथों में काफी पवित्र बताया गया है।

हिमालय पर्वत शृंखला के धौलागिरि पर्वत के मुक्तिधाम से निकली गंडक नदी गंगा की सप्तधारा में से एक है।

नदी तिब्बत व नेपाल से निकलकर उत्तर प्रदेश के महराजगंज, कुशीनगर होते हुए बिहार के सोनपुर के पास गंगा नदी में मिल जाती है।

इस नदी को बड़ी गंडक, गंडकी, शालिग्रामी, नारायणी, सप्तगंडकी आदि नामों से जाना जाता है।

इसी नदी में महाभारत काल में गज और ग्राह (हाथी और घड़ियाल ) का युद्ध हुआ था,

जिसमें गज की गुहार पर भगवान कृष्ण ने पहुंचकर उसकी जान बचाई थी।

जरासंध वध के बाद पांडवों ने इसी पवित्र नदी में स्नान किया था। इस नदी में स्नान व ठाकुर जी की पूजा से संसारिक आवागमन से मुक्ति मिल जाती है।

गंडक नदी व भगवान के पत्थर बनने की बड़ी रोचक कथा वर्णित है।

शंखचूड़ नाम के दैत्य की पत्नी वृन्दा भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। वे भगवान को अपने हृदय में धारण करना चाहती थी। 

पतिव्रता वृन्दा के साथ छल करने के कारण वृंदा ने भगवान को श्राप देते हुए पाषाण (पत्थर) हो जाने व कीटों द्वारा कुतरे जाने का श्राप दे दिया था।

भक्त के श्राप का आदर कर भगवान पत्थर रूप में गंडक नदी में मिलते हैं।

भगवान विष्णु के जिस शालीग्राम रूप की पूजा होती है वह विशेष पत्थर (ठाकुर जी) इसी नारायणी (गंडक ) में मिलता है।

यह नदी काफी दूर तक उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों के बीच सीमा निर्धारित करती है।

उत्तर प्रदेश में यह नदी महराजगंज और |कुशीनगर जिलों से होकर बहती है।

बिहार में यह चंपारन, सारन और मुजफ्फरपुर जिलों से होकर बहती हुई १९२ मील के मार्ग के बाद पटना के संमुख गंगा में मिल जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग १३१० किलोमीटर है।

बिहार में यह चंपारन, सारन और मुजफ्फरपुर जिलों से होकर बहती हुई १९२ मील के मार्ग के बाद पटना के संमुख गंगा में मिल जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग १३१० किलोमीटर है।

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